Akhiri yatri

 शीर्षक: "आखिरी यात्री"


लखनऊ के व्यस्त रेलवे स्टेशन पर रात के अंतिम पहर में एक बूढ़ा आदमी प्लेटफार्म के किनारे एक बेंच पर बैठा था। उसके कपड़े पुराने और फटे हुए थे, आंखों में गहरी उदासी थी, और कांपते हाथों में एक पुराना टिकट दबा हुआ था। टिकट पर तारीख तीन साल पुरानी थी। 

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रेलवे पुलिस के एक सिपाही ने उसे देखा और पास आकर पूछा, "बाबा, कहां जाना है?"

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बूढ़े ने हल्की सी मुस्कान के साथ कहा, "बेटा, उसी ट्रेन का इंतजार कर रहा हूं, जो तीन साल पहले मुझे छोड़कर चली गई थी।"

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सिपाही ने हैरानी से कहा, "बाबा, वह ट्रेन तो अब बंद हो चुकी है। अब वह नहीं आएगी।"

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बूढ़े ने गहरी सांस ली और धीरे से कहा, "फिर भी मैं इंतजार कर रहा हूं... शायद आज आ जाए।"

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सिपाही ने आगे पूछा, "कौन सी ट्रेन थी वो?"

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बूढ़े ने आकाश की ओर देखा और कहा, "वही ट्रेन, जिसमें मेरी बेटी थी। वह वादा करके गई थी कि लौटकर मुझे ले जाएगी। लेकिन वह कभी नहीं लौटी। उस दिन के बाद से मैंने अपनी जगह नहीं बदली। शायद वह आ जाए, शायद मेरी ट्रेन फिर से आ जाए।"

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सिपाही चुप हो गया। घड़ी रात के तीन बजा रही थी। स्टेशन पर वीरानी थी। अचानक हवा का एक झोंका आया और बूढ़े के हाथ में दबा टिकट उड़कर पटरी पर जा गिरा। 

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बूढ़े ने हल्की मुस्कान के साथ किसी अनदेखी चीज़ को देखा। और अगले ही पल, वह बेंच पर हमेशा के लिए शांत हो गया। 

सुबह जब लोग स्टेशन पर पहुंचे, तो बेंच पर सिर्फ उसका निर्जीव शरीर था, और प्लेटफार्म पर वह पुराना टिकट पड़ा था—मानो किसी ने उसे लेने के लिए वहीं रख दिया हो। 


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शिक्षा (Moral):

यह कहानी हमें सिखाती है कि इंतजार और उम्मीद के बीच एक महीन रेखा होती है। कभी-कभी, हम अपनों से जो वादे सुनते हैं, वे वक्त की धूल में खो जाते हैं, लेकिन दिल उन्हें आखिरी सांस तक सच मानता है। जीवन में आगे बढ़ना जरूरी है, क्योंकि जो पीछे छूट गया, वह हमेशा लौटेगा, यह जरूरी नहीं। हमें अपनों के साथ रहते हुए उनकी कद्र करनी चाहिए, ताकि कोई अपना किसी स्टेशन पर अकेला इंतजार न करता रह जाए।

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